हजारों पैकेट नमक को देखने वाला कोई नहीं। तीन वर्षों में भी नमक नहीं पहुँचा गरीब लाभुकों के घर।

          भारत का इतिहास इस बात का गवाह है कि महात्मा गांधी ने  नमक सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत कर देश में आजादी की बिगुल बजाई  थी। लेकिन आज  झारखंड सरकार की लापरवाही का खामियाजा हजारों पूर्वविक्ता प्राप्त गृहस्थ एवं अंत्योदय परिवार के लाभुकों को भुगतना पड़ रहा है। बड़े अफसोस की बात है कि झारखंड सरकार के द्वारा साहिबगंज जिला के प्रखंड आपूर्ति विभाग को हजारों पैकेट नमक उपलब्ध वर्ष 2015 में ही कराया गया था। नमक का उत्पादन भगवती केमफूड प्राइवेट लिमिटेड नागौर राजस्थान ने किया है जिस पर शुद्ध वजन 1 किलो और मूल्य 50 पैसे अंकित है ।पैकिंग का माह एवं वर्ष 5/2016 है जिसमें यह भी अंकित किया गया है कि पैकिंग के 2 वर्ष के बाद इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता ।बताते चलें कि साहिबगंज जिला के बोरियो प्रखंड के माल गोदाम के बाहर हजारों पैकेट नमक यूं ही वर्षा के मौसम में भी खुला पड़ा हुआ है जिसको देखने वाला कोई नहीं ।कई पैकेटों से नमक फटकर पानी के बहाव के साथ मिट्टी में मिलता चला जा रहा है । झारखंड सरकार ने वर्ष 2015 में ही प्रखंड आपूर्ति विभाग को यह नमक उपलब्ध कराया था लेकिन आज स्थिति ऐसी है कि इस नमक को चखने वाला भी कोई नहीं है ।यह नमक केवल पूर्वविक्ता प्राप्त गृहस्थ एवं अंत्योदय परिवारों के लिए उपलब्ध कराया गया था लेकिन आज तक यह लाभुकों के घरों तक पहुंच ही नहीं पाया है । इस संबंध में पूछे जाने पर बोरियो प्रखंड के एजीएम प्रभारी सुभाष दास का कहना है कि उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है और यह नमक कब आया और इसकी क्या दुर्गति हुई है इसके बारे में वह कुछ भी नहीं बता सकते हैं ।काफी मशक्कत के बाद  श्री दास ने बताया कि 1 वर्ष पूर्व इस नमक का विभागीय जांच कराया गया था


लेकिन रिपोर्ट आने के बाद भी इसे उत्पादक कंपनी को वापस  नहीं किया गया। श्री दास बताते हैं कि रिपोर्ट में आयोडीन की अधिक मात्रा होने की बात बताई गयी थी ।निश्चय ही नमक को गोदाम  तक  पहुँचाने में सरकार ने राजस्व का व्यय किया होगा 
लेकिन क्या यह राजस्व सरकार के कोष तक वापस पहु़ँचा। ज्ञात हो कि बोरियो प्रखण्ड आदिवासी बहुल क्षेत्र है। ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति शोचनीय है। सुदूर  पहाड़ियों पर रहनेवाले परिवारों को महज नमक-भात से गुजारा करना होता है जो सरकार द्वारा उपलब्ध कराये गये लाभुक योजना  पर निर्भर है। ऐसी स्थिति  में झारखंडी नमक की यह दुर्दशा लापरवाही का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
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