रांची : संथाल का गोड्डा लोकसभा प्रदेश बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। सियासत के कई दिग्गज नामों की मौजूदगी से यहां की बिसात एक बार फिर बेहद दिलचस्प हो गई है। वैसे आजादी के बाद से ही हर चुनाव में इस इलाके की भूमिका बेहद रोचक रही है। सियासत में कहावत है कि राजनीत में कोई नीत नहीं होती गोड्डा सीट कांग्रेस, बीजेपी के बीच टक्कर रही है। बीजेपी का गढ़ माने जाने वाला सीट सभी विपक्ष एक जुट होकर महा गठबंधन प्रत्याशी दे कर बीजेपी को घेरने की कोशिश की गई है 2009 और 2014 के चुनाव में बीजेपी नेता डॉ निशिकांत दुबे ने सीट कब्जा किया लगभग हर चुनाव में वही दो ही पार्टियां सत्ता में काबिज हुई या लेकिन जिसमे वेसे तो संतालपरगना जेएमएम का गढ़ माना जाता है ऎसे में गोड्डा लोकसभा बीजेपी के किला को ढेर करने के लिए महागठबंधन के प्रत्याशी प्रदीप यादव को चुनाव के मैदान में उतारा है । वहीं डॉ आशा साहू (माकड़े) पिछड़ा समाज पार्टी यूनाइटेड से चुनाव लड़ रही है वे भी इसी इलाके में पूरा दमखम लगा रही हैं।पिछड़ी जातियों दलितों अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर एनडीए व महागठबंधन के खिलाफ खड़ी है अब यहां से अटकलें लगाई जा रही डॉ आशा साहू निशिकांत दुबे और प्रदीप यादव की पूरी समीकरण बिगाड़ देगी । अबकी बार मुकाबला सबसे दिलचस्पः पिछड़ा समाज पार्टी से यूनाइटेड डॉक्टर आशा साहू का मानना है कि गोड्डा लोकसभा क्षेत्र वैश्य समाज पिछड़ी जातियों अल्पसंख्यक समुदाय मतदाता सीट का निर्णायक है सभी उसे सिर्फ वोट बैंक का इस्तेमाल किया है उन्हे उभरने का मौका नहीं दिया है डॉ आशा साहू अल्पसंख्यक, अत्यंत पिछड़ी जाति, आदिवासियों की आवाज बनेंगी डॉ आशा महिलाओं के सशक्तिकरण, सभी सेक्टर में 50% का आरक्षण की लड़ाई लड़ रही है लोगों का मनाना है डॉ आशा गोड्डा के लिए आशा की किरण बनेगी इस क्षेत्र को कृषि औद्योगिक विकास के लिए प्रयास करेंगी । गोड्डा लोकसभा सीट पिछड़ी जातियों और मुस्लिम वोटरों का दबदबा है अनुसूचित जनजाति 11% और अनुसूचित जनजाति 12% है पिछड़ी जातियों को गोलबंदी के कारण बीजेपी यहां से अच्छा प्रदर्शन करने मे सफल हुई है डॉ आशा साहू पिछड़ी जाति, वैश्य समाज से आती है अगर चुनाव में पिछड़ी जातियों एवं अल्पसंख्यक वोटरों का समर्थन मिला तो निशीकांत दुबे व प्रदीप यादव का समीकरण बिगाड़ सकती है दूसरी तरफ गिले-शिकवे भुलाकर अल्पसंख्यक एवं पिछड़ी जाति एवं आदिवासी एक जुट होकर समर्थन माँग रही है डॉ आशा पर मतदाताओं का भरोसा होता है तो मुकाबले को सबसे दिलचस्प बना देगा।
क्या कहते हैं यहां के जातिगत समीकरणः वैसे तो देश के अधिकांश इलाकों में राजनीति में जातिगत समीकरण खासे मायने रखते हैं। लेकिन बिहार के बाद झारखंड में भी जातियों की गोलबंदी का सबसे ज्यादा चलन गोड्डा लोकसभा क्षेत्र में देवघर मधुपुर जामताड़ा दुमका महागामा आदि क्षेत्रों में दलितों-मुस्लिमों का प्रभाव सवर्ण-ओबीसी से ज्यादा है बीजेपी महा गठबंधन अन्य पार्टियों का समीकरण पर इसी टिकी हुई है।



Post A Comment:
0 comments so far,add yours