रक्षा बजट बनाते समय किसी भी सरकार को कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए.  इसमें प्रक्रिया को सहज और सरल बनाने के साथ-साथ सेना के संगठनात्मक संरचना पर भी ध्यान देना चाहिए. हालांकि 2018-19 के बजट में इस बात के मद्देनज़र कुछ बातें चिंताजनक हैं.

कहीं न कहीं हमें सेना के संगठनात्मक संरचना पर ध्यान देना होगा. गुरुवार को पेश हुआ बजट इस बात पर सवालिया निशान खड़ा करता है कि क्या वास्तव में हम सेना के रोज़मर्रा क्रियाकलाप पर इतना पैसा खर्च कर सकते हैं.

इस बजट का एक महत्त्वपूर्ण भाग है सेना को आधुनिक बनाने के लिए सरकार द्वारा बजट में दिए गए पैसे. अगर हम अपनी प्रक्रिया को सुधार भी लें और बलों की संख्या में कमी भी कर दें तो भी इतने पैसों से सेना को आधुनिक बनाना आसान नहीं होगा. हम भले कहते रहें कि हम सेना को आधुनिक बनायेंगे लेकिन इतने पैसों से हम जिस रफ्तार से सेना का आधुनिकीकरण करना चाहते हैं वो नहीं कर पायेंगे.

इसका एक दूसरा रास्ता हो सकता है कि सशस्त्र बलों की पेंशन में कटौती कर दी जाये. लेकिन जिसने देश को 30-40 साल तक सेवा दी है उसे पेंशन न देना न्यायसंगत नहीं होगा. इस बार का रक्षा पेंशन बजट 1.08 लाख करोड़ रुपये का रहा, जो कि एक बड़ी रकम दिखती है लेकिन अगर नागरिक सेवाओं की पेंशन पर खर्च की जाने वाली रकम से इसकी तुलना की जाये तो हम पाते हैं कि नागरिक सेवाओं के लिए पेंशन का खर्च इससे 3-4 गुना है.
एक अन्य विकल्प है कि पूरी इंफ्रास्ट्रक्चर को इस तरह से बदल करके सुधार दिया जाये कि सशस्त्र बलों के रोज़मर्रा के क्रियाकलापों पर राजस्व खर्च को कम किया जा सके और सेना के आधुनिकीकरण के लिए पूंजीगत खर्च को बढ़ाया जा सके. बता दें कि सेना के वेतन इत्यादि खर्च राजस्व खर्च के अन्तर्गत आते हैं जबकि सेना के आधुनिकीकरण का खर्च पूंजीगत खर्च के अंतर्गत आता है.

हालांकि इस साल का राजस्व खर्च 1.95 लाख करोड़ है जो कि पूंजीगत खर्च का लगभग दोगुना है. इस साल का पूंजीगत खर्च 99,500 करोड़ रुपये है.

हमारी चिंता हमेशा संख्या की रहती है. हम सैनिकों की व डिवीज़न की संख्या को बढ़ाना चाहते हैं. जब भी हम थल सेना की बात करते हैं तो हम कहते हैं कि हमे जहाज़ों के फ्लीट की संख्या बढानी है और जब भी वायुसेना की बात करते हैं तो कहते हैं कि स्क्वॉड्रन की संख्या बढ़ानी है. पर वास्तविकता ये है कि चूंकि हमारी क्षमताएं अब बढ़ चुकी है इसलिए संख्या बढ़ाने के बजाय हमें कम ध्यान देना चाहिए.

आज के समय में एक एयरक्राफ्ट की जो क्षमता है वो आज के 10-15 साल पहले के एयरक्राफ्ट की तुलना में कहीं अधिक है. राफेल के एक स्क्वॉड्रन की क्षमता मिग की एक स्क्वॉड्रन की क्षमता से कहीं ज़्यादा है. आज के तोपों की ताकत द्वितीय विश्वयुद्ध की तोपों से कहीं ज़्यादा है. और यही बात थलसेना की जहाज़ों के लिए भी लागू होती है.

लेकिन दिक्क्त ये है कि हमारी व्यवस्था बहुत ही पिछड़ी हुई है. हमको संख्या बढ़ाने के बजाय इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि तकनीकी रूप से इन्हें और बेहतर कैसे बनाया जा सके. जैसे-जैसे क्षमता बढ़ेगी वैसे-वैसे सेना की संख्या में खुद-ब-खुद कमी आ जायेगी. इसलिए हमें संख्या के बजाय तकनीक व क्षमता पर ध्यान देने की ज़रूरत है.

कुल मिलाकर मेरा मानना है कि रक्षा क्षेत्र के लिए जितना पैसा आवंटित किया गया है वो बहुत कम है और निश्चित रूप से ये सेना के आधुनिकीकरण के लिए पर्याप्त नहीं है.
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