रांची की सड़कों पर लोग महफूज नहीं हैं. आए दिन यहां की सड़कें खून मांगती हैं. ट्रैफिक पुलिस के आंकड़ें यह चीख-चीख कर कह रहे हैं. साल 2017 की बात करें तो राजधानी में कुल 745 हादसे हुए, जिनमें 437 लोग अपनी जान सड़क पर ही गवां बैठे. इन हादसों के शिकार ज्यादातर कम उम्र के बच्चे हुए.

रांची पुलिस का कभी नारद, कभी यमराज तो कभी सांता बनकर सड़क पर उतरना सफल साबित नहीं हुआ. पुलिस ने लोगों और युवाओं को ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूक बनाने के लिए तमाम प्रयास किए. लेकिन तेज रफ्तार का रोमांच पाने की ललक में युवा आज भी यातायात सुरक्षा नियमों की अवहेलना करते राजधानी की सड़कों पर दिख जाते हैं.

हालांकि ट्रैफिक पुलिस ने एनजीओ के साथ मिलकर सड़क सुरक्षा को लेकर कई अवेयरनेस कार्यक्रम चलाए. सड़कों पर सख्ती भी दिखाई, लेकिन इसका कोई खास असर युवाओं पर होता नहीं दिख रहा. लिहाजा आये दिन कोई ना कोई हादसा राजधानी में होते रहता है.

ट्रैफिक डीएसपी दिलीप खलखो बताते हैं कि जागरुकता अभियान के जरिये लोगों को अवेयर किया गया, तो वहीं जनवरी 2018 से मार्च 2018 के बीच लोगों से करीब सवा करोड़ रुपए बतौर फाइन भी वसूला गया बावजूद इसके रफ्तार के चलते सड़क हादसों में कमी नहीं आ रही है. ऐसे में अभिभावकों को इस दिशा में कदम उठाने होंगे.



आंकड़ों पर गौर करें तो 2017 में जनवरी से लेकर दिसंबर तक राजधानी में कुल 745 सड़क हादसे हुए, जिनमें 437 लोगों ने जान गंवाई, जबकि 317 लोग गंभीर रूप से घायल हुए और 30 लोग मामूली रूप से जख्मी. बात 2018 की करें तो बीते 10 मार्च को रांची के नामकुम में तेज रफ्तार बाइक अनियंत्रित होकर डिवाइडर से टकराई, जिसमें एक युवक का सिर धड़ से अलग हो गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गयी, जबकि दूसरे ने अस्पताल जाते समय दम तोड़ दिया. 16 अप्रैल को नामकुम थाना क्षेत्र में ही बाइक ट्रक की चपेट में आ गयी और दो युवकों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई.

सड़क हादसे के ज्यादातर घटनाओं में दो बातें कॉमन नजर आती है. पहली तेज रफ्तार और दूसरी सड़क सुरक्षा नियमों की अनदेखी. आम लोग भी मानते हैं कि इन जैसे हादसों को रोकने के लिए अभिभावकों को अपना योगदान देना होगा, तो वहीं प्रशासन को भी और सख्त होना होगा। जिंदगी अनमोल है, रांची के युवाओं को भी यह समझना होगा.
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