अशोक कुमार शर्मा
पलासी युद्ध में अंग्रेजी हुकूमत के हाथों हुई नबाब सिराजुद्दोला की हार ने भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना का मार्ग सन1756 ई° में ही खुल चुका था ।सन 1763 ई• में संताल परगना स्थित उधवा नाला की लड़ाई में मीरकासिम की हार तथा 1764 के युद्ध में मुगल सम्राट शाह आलम अवध के नवाव सिराजुद्दोला तथा मीर कासिम की संयुक्त सेना की पराजय ने बंगाल को अंग्रेजी शासन की जंजीरों में जकड़ दी जिससे अंग्रेजी हुकूमत को अवध तथा दिल्ली तक पहुंचने में मददगार साबित हुआ और इसी के साथ धीरे धीरे समस्त भारत में अंग्रेजी हुकूमत को पनपने में मदद मिली ।अंग्रेजों की जुल्म और अत्याचार के कारण भारतवासी आतंक के साये में दिन गुजारने पर मजबूर हो गये ।अंग्रेजों के जुल्म व अत्याचार से निजात पाने के लिए आतुर हो उठे वहीं संताल आजादी हासिल करने के लिए व्याकुल थे ।जिसके चलते अंग्रेजों ने संतालों की आजादी को हमेशा हमेशा के लिए कुचल देने की नीयत से उनके उपर अपनी प्रशासनिक गुलामी लाद दी गई और महाजनों को भी संतालों का शोषण ,दमन ,अत्याचार हेतु छुट दे दी गई ।परन्तु शोषण दमन अत्याचार ने संतालों को एक सूत्र में ला खड़ा कर दिया और संताल अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए बाबा तिलका मांझी के यहां एकत्रित होने लगे ।तिलका मांझी ने भी अंग्रेजी शासकों के खिलाफ सत्ता उखाड़ फेकने का कसम खा कर मोर्चा खोल दिया गया ।घने जंगलों तथा पहाड़ र्पवतों से अश्चादित झारखंड कहे जाने वाले मुगेर ,भागलपुर और संताल परगना के पहाड़ी क्षेत्रों में तिलका मांझी का अंग्रेज शासकों व सेना के बीच अनेकों बार लड़ाईयां हुई ।इसी दौरान सन 1784 में तिलका मांझी द्वारा भागलपुर पर आक्रमण कर दिया गया । 13जनवरी 1784 को तिलका मांझी द्वारा एक ताड़ के पेड़ पर चढ़ कर घोड़े पर सवार होकर आने वाले भागलपुर के कलकटर की छाती में तीर मार कर उसकी हत्या कर दी गई ।30 जून 1855 ई• में संतालों ने सिद्धो कान्हों के नेतृत्व में अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया गया ।सन  1942 ई• में बाबा लाल हेम्बरम द्वारा एलान कर दिया गया कि न अंग्रेजी हुकुमत मानो और न उनकी कचहरियों से न्याय की मांग करो ।           आगे जारी ।
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