झारखंड की महिलाएं संभाल सकती है घर और बाहर।
रांची (केलांचल टीम)-
अपने अध्ययन काल से ही महुआ मांझी राजनीतिक कार्यों में अभिरुचि रखती हैं। यह झारखंड की मूल निवासी है। बचपन से ही इनका झारखंड की मिट्टी से लगाव और समाज सेवा से जुड़ाव रहा है। देश विदेश के बहुत सारे संगठनों  के साथ मिलकर इन्होंने कार्य किया है। झारखंड को सपनों का झारखंड कैसे बनाएं-इसके लिए यह सतत प्रयत्नशील हैं। इन्होंने आदिवासी समुदाय को काफी करीब से जाना है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के आदर्श सुप्रीमो शिबू सोरेन जी के साथ इनके पारिवारिक संबंध विगत 4 दशकों से रहे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा में केंद्रीय महिला अध्यक्ष के पद को दूसरे सत्र में भी  सुशोभित कर रही हैं। इन्होंने "मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ "और "मैं बोरिशाइल्ला" जैसे महत्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की है। इनकी दूसरी पुस्तक "मैं बोरिशाइल्ला"हिंदी व अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुकी है। "मैं बोरिशाइल्ला" यूरोप  के सबसे बड़े विश्वविद्यालय यूनिवर्सिटी ऑफ रोम इटली के स्नातक के कोर्स में मॉडर्न लिटरेचर के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इस पुस्तक के सौजन्य भारत के अधिकांश राज्यों के विश्वविद्यालय में उपन्यासों पर एम०फिल०, पीएचडी व डिलीट की डिग्रियां मिल रही है। श्रीमती महुआ मांझी को बहुत सारे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं जिसमें फणीश्वर नाथ रेणु सम्मान, उज्जैन में विश्व हिंदी सेवा सम्मान, कथा UK सम्मान जैसे महत्वपूर्ण पुरस्कारों से नवाजा गया है। श्रीमती माँझी बताती है कि हेमंत जी ने भी महिलाओं के लिए काफी कार्य किया है। आगामी चुनाव की तैयारी पार्टी के दिशा निर्देश पर वे कर रही हैं। महिलाओं को संदेश देते हुए हुए कहती हैं कि उन्हें सशक्त होना जरूरी है ।झारखंड की महिलाएं घर और बाहर संभाल सकती हैं ।महिलाओं को अगर शिक्षित और स्वावलंबी बनाया जाए तो राज्य को आगे बढ़ाने में वह अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। महिलाओं को उन्हें अधिकार देना होगा झारखंड को स्वर्ग बनाना होगा।

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