झारखंड के गोड्डा जिले में पावर ग्रिड को लेकर जमीन अधिग्रहण की अंतिम प्रक्रिया होने के बाद घेराबंदी का काम जारी है. हालांकि इस घेराबंदी के दायरे में कुछ ऐसे आदिवासी आते हैं, जो पहले दिन से ही जमीन देने के पक्षधर नहीं रहे, लेकिन जमीन अधिग्रहण कानून 2013 के मुताबिक 80 प्रतिशत आदिवासियों की भी अगर सहमति मिल जाती है तो वह काफी है.

बता दें कि पावर ग्रिड कंपनी के एक अधिकारी के पैरों पर गिरकर आदिवासी महिलाओं ने अपने खेतों की फसलों को नष्ट न करने की अपील करते हुए घेरबंदी का विरोध किया था. फिर भी अधिकारियों ने उनकी धान की फसलों को रौंदते हुए घेराबंदी का काम शुरू करा दिया था.

पीड़ितों का कहना है कि यह जमीन जो उनकी अन्नदाता है, वही उनकी पूरे जीवन की पूंजी भी है. बहुत मुश्किल से धान बेचकर इस वर्ष खेती की गई थी, लेकिन कंपनी द्वारा बगैर उनकी रजामंदी के फसलों पर जेसीबी मशीन चला दी गई. पीड़ितों का कहना है कि यह जमीन करीब 16 बीघा, 16 कट्ठा और 7 धुर में फैली है. जमीन के एवज में न तो उन्हें कोई नोटिस मिला और ना ही आदिवासी ग्रामीणों ने जमीन का मुआवजा लिया है.

पावर ग्रिड कंपनी के अधिकारी अभिमन्यु कुमार की मानें तो सरकार की तरफ से जिला प्रशासन ने उन्हें इस माली गंगटा मौजा को लेकर 166 एकड़ जमीन की भूमि स्वामित्व प्रमाण पत्र (एलपीसी) सौंपी है, जिसके आधार पर ही वे ये काम करवा रहे हैं.

वहीं मामले में जिला उपायुक्त से पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उनके नाम जमीन का पैसा अवार्ड के तौर पर रखा हुआ है. एक आखिरी बार उन्हें फिर नोटिस भेजा जाएगा, अगर उसके बाद भी वे पैसे नहीं लेते हैं तो मामले को ट्रिब्यूनल में कमिश्नर को अग्रसारित कर दिया जाएगा.

बहरहाल, इस पूरे मामले पर कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ, यह तो जांच के बाद ही पता चल पाएगा.
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