दुमका: वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव कई मायने में बदल चुकी है। इन पांच वर्षों में संथाल की रजनीति भी करवट ले रही है। अमूमन झामुमो की परंपरागत रजनीति का केंद्र माने जाने वाले संथाल परगना के दो प्रमुख सीट दुमका और राजमहल में जिस प्रकार से झामुमो को अपनी अंतर्कलह के कारण उम्मीदवारों के नामों की घोषणा करने में परेशानी हुई है, आने वाले दिनों में हेमंत सोरेन के लिए यह और भी चुनौती भरा होगा। दिशोम गुरु शिबू सोरेन भले ही आदिवासियों के सर्वमान्य नेता हों परंतु, उनकी बढ़ते उम्र और गिरते स्वस्थ्य के बावजूद हेमंत दुमका लोस से गुरु जी के उत्तराधिकारी चुनने का साहस नहीं दिखा पाए। गुरुजी के स्वास्थ्य के कारण बीते पांच सालों में बतौर सांसद उनकी भूमिका सर्वविदित है। ऐसे में दुमका की जनता का विमुख़ीकरण और मोहभंग न हो यह हेमंत के लिए सबसे बड़ा चैलेंज होगा। दुमका सीट बचाए रखना झामुमो की साख बचाए रखने के बराबर है।
वहीं, मोदी लहर के बावजूद बीते चुनाव में हार का मुंह देखने वाले सुनील सोरेन पर भाजपा ने पुनः जिस प्रकार से विश्वास जताया है यह उनकी साफ़ सुथरी छवि और ग़ैर आदिवासियों के बीच अच्छी लोकप्रियता का नतीजा है। भाजपा जिस प्रकार से पूरे देश में आक्रामक तरीक़े से चुनाव लड़ रही है ऐसे में झामुमो की एक चूक से दुमका में सुनील सोरेन गेम चेंजर बन जायें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी.
राजमहल: झामुमो के गढ़ राजमहल में झामुमो के जयचंद ही झामुमो का क़िला ढाहने में लगे हुए हैं। पाकुड़ के पूर्व विधायक अकील अख्तर, बोरियो के पूर्व विधायक लोबिन हेम्ब्रम ने पार्टी के अंदरखाने एक ओर जहां खुल कर मोर्चा खोला हुआ था वहीं, महेशपुर विधायक स्टीफन मरांडी स्वंय व लिट्टीपाड़ा विधायक साइमन मरांडी पुत्र को राजमहल से चुनाव लड़ाने के महत्वाकांक्षी रहे विजय के विरोध में एकजुट थे। इसके अलावे बीते पांच सालों में विजय द्वारा फुटबाॅल और पीएम सड़क योजना का शिलान्यास/उद्घाटन के अलावे विशेष जन कल्याणकारी योजनाएं धरातल पर दिखाई नहीं देती हैं। इससे वोटर भी नाराज हैं परंतु, भाजपा विरोधी माने जाने वाले वाले 5 लाख से अधिक मुस्लिम मतदाताओं के पास झामुमो प्रत्याशी को वोट देने के अलावे शायद कोई विकल्प नहीं रहेगा।
इस बीच भाजपा में प्रवेश के साथ ही लगातार हार का मुंह देखने वाले हेमलाल मुर्मू को प्रत्याशी बनाए जाने से पार्टी के भीतर ही अंर्तकलह मुखर है। बोरियो विधायक ताला मरांडी विरोध में खुल कर ताल ठोंक रहे हैं वहीं, बरहेट में उनके धुर विरोधी व साहेबगंज की वर्तमान जिप अध्यक्ष रेणुका मुर्मू के अलावे टिकट के अन्य दावेदार पाकुड़ के जिप अध्यक्ष बाबूधन मुर्मू, पूर्व सांसद देवीधन बेसरा आदि को अपने पक्ष में करना एक बड़ी चुनौती होगी। हलांकि, भाजपा ने बोरियो में ताला के चाभी के रूप में महेन्द्र हांसदा को प्रमोट कर सकती है। माना जाता है कि महेन्द्र के पास 25 हजार का वोट बैंक है। ऐसे में झामुमो व भाजपा के आपसी भीतरघात के बीच वोटर किसके प्रति अपनी निष्ठा दिखाएगें, ये आने वाला वक्त ही बताएगा।
गोड्डाः गोड्डा लोस में निशिकांत दुबे ने जिसप्रकार से बीते दस सालों में अपने विरोधियों को परास्त किया है, 2019 के चुनाव में शायद यह इतना आसान नहीं होगा। हलांकि, दस सालों में निशिकांत ने अपनी छवि विकास पुरूष की बनाई है और कई उल्लेखनीय कार्य भी किए हैं परंतु, उन्होंने अपने लिए कर्ता नहीं बनाए। निशिकांत दूबे के लिए चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट रखकर उनसे लाभ लेने की होगी। इस बीच निशिकांत यदि पूर्व सांसद फुरकान अंसारी को मैदान में उतारने में सफल रहे तो उनकी जीत सुनिश्चित मानी जाएगी वरना महागठबंधन के प्रत्याशी प्रदीप यादव उन्हें तीसरी बार लगातर संसद पहुंचने से रोकने में सफल हो सकते हैं।
बहरहाल, इनत तमाम चीजों के बावजूद मतदान से पूर्व मुद्दे क्या होंगे, वोटरों का मूड क्या होगा यह तो अंत में ही पता चल पाएगा। परंतु, 2019 के लोस चुनाव में संथाल की राजनीति का उंट किस करवट बैठेगा इस पर सब की नजर रहेगी।



Post A Comment:
0 comments so far,add yours