रांची। झारखंड में अगर लालटेन की रोशनी साल दर साल मद्धिम होती गई तो उसकी बड़ी वजह पार्टी में व्याप्त अंदरूनी कलह रही है। प्रदेश राजद को संभाल पाने में खुद को अक्षम महसूस करने के बाद अन्नपूर्णा देवी ने पिछले दिनों राजद छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा ने उन्हें कोडरमा से प्रत्याशी बनाया और वह रिकार्ड मतों से जीत गईं। अन्नपूर्णा के दल छोडऩे के बाद पार्टी प्रमुख ने गौतम सागर राणा को एक बार फिर झारखंड राजद की कमान सौंपी, लेकिन पार्टी में स्थिरता लाने में वह भी नाकामयाब साबित हुए।

प्रदेश राजद की मौजूदा स्थिति की बात करें तो वह आज दो खेमे में बंटा नजर आता है। पिछले दिनों एक गुट ने प्रदेश अध्यक्ष गौतम सागर की तस्वीर फाड़ डालने का आरोप प्रदेश युवा अध्यक्ष और उनके सहयोगियों पर मढ़ा। इसे लेकर पार्टी की दोनों इकाइयों के बीच द्वंद्व जारी है। पार्टी ने महागठबंधन के सीट शेयङ्क्षरग फार्मूले को भी खारिज कर दिया। राजद के खाते में सिर्फ पलामू सीट आया था, परंतु राजद ने महागठबंधन के प्रत्याशी मनोज यादव के होते हुए चतरा में सुभाष यादव को उतार दिया। दुष्परिणाम सामने है।

यहां यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राज्य गठन के बाद प्रदेश राजद की सक्रियता का ग्राफ गिरने का सिलसिला जो शुरू हुआ, उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी। अविभाजित बिहार में झारखंड से इनके नौ विधायक हुआ करते थे। 2005 में यह संख्या घटकर सात हो गई और 2009 में पांच। 2014 में इनका सुपड़ा ही साफ हो गया। यह स्थिति तब हुई, जब झामुमो नीत वाली तत्कालीन हेमंत सोरेन की सरकार में राजद के कोटे से दो मंत्री थे। प्रदेश में राजद की बद से बदतर होती स्थिति की यह बानगी भर है।
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