भीमा कोरेगांव केस में पुणे पुलिस ने दूसरी बार रांची में फादर स्टेन स्वामी के घर छापेमारी की. बुधवार सुबह करीब चार घंटे तक चली तलाशी के बाद पुलिस फादर के घर से कम्प्यूटर हार्ड डिस्क, सिम कार्ड और कुछ कागजात अपने साथ ले गयी. हालांकि पुणे पुलिस ने छापेमारी को लेकर कुछ भी नहीं कहा. पुलिस ने बंद कमरे में फादर से पूछताछ भी की.

छापेमारी के बाद फादर स्टेन स्वामी ने कहा कि वह कानूनी जांच के लिए तैयार हैं. पुणे पुलिस ने दूसरी बार उनके घर में छापेमारी की. इस बार कम्प्यूटर हार्ड डिस्क और इलेक्ट्रॉनिक डिटेल्स साथ ले गई है. मराठी में लिखे कुछ कागजात पर साइन करवाया. जिसका अंंग्रेजी अनुवाद हमने मांगा है. पुलिस ने दो- तीन में उपलब्ध कराने का भरोसा दिलाया है.

इससे पहले पिछले साल अगस्त में भी पुणे पुलिस ने रांची पहुंच कर फादर स्टेन स्वामी के घर छापेमारी की थी. पुणे पुलिस ने तब स्टेन स्वामी के घर से लैपटॉप, कम्प्यूटर सहित कई कागजात जब्त किए थे. फादर से पूछताछ भी की गई थी. इसके बाद पुणे पुलिस वापस लौट गई थी.

फादर स्टेन के खिलाफ देशद्रोह का मामला भी दर्ज किया गया था. रांची में नामकुम बगीचा में फादर का घर है. उनपर महाराष्ट्र के अलनगर परिषद नक्सली संगठन को समर्थन देने का आरोप है. फादर स्टेन मूलरूप से केरल के रहने वाले हैं. लेकिन बीते 50 सालों से झारखंड में रहकर काम कर रहे हैं. पहले चाईबासा में रहकर आदिवासी संगठनों के लिए काम करते रहे. 2004 में रांची आकर आदिवासी अधिकार और विस्थापन के मुद्दे पर काम करते रहे हैं.

स्टेन स्वामी हाल के दिनों में झारखंड के विभिन्न जिलों में आदिवासी कैदियों के लिए काम करते रहे हैं. उनके समर्थकों के मुताबिक फादर वैसे आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं, जिन्हें नक्सली बताकर जेल में डाल दिया गया. फादर स्टेन की पहचान एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में है.

भीमा-कोरेगांव क्या है?

भीम कोरेगांव महाराष्ट्र के पुणे जिले में है. इस छोटे से गांव से मराठा का इतिहास इतिहास जुड़ा है. 200 साल पहले यानी 1 जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कपंनी की सेना ने पेशवा की बड़ी सेना को कोरेगांव में हरा दिया था. पेशवा सेना का नेतुत्व बाजीराव II कर रहे थे. बाद में इस लड़ाई को दलितों के इतिहास में एक खास जगह मिल गई. बीआर अम्बेडकर को फॉलो करने वाले दलति इस लड़ाई को राष्ट्रवाद बनाम साम्राज्यवाद की लड़ाई नहीं कहते हैं. दलित इस लड़ाई में अपनी जीत मानते हैं. उनके मुताबिक इस लड़ाई में दलितों के खिलाफ अत्याचार करने वाले पेशवा की हार हुई थी.
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