जिस पार्टी का इतिहास काफी गौरवशाली रहा है। देश को आजाद कराने से लेकर आजादी के बाद देश को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का रहा है। वह पार्टी कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण सांगठनिक रूप से काफी कमजोर हो गयी है। एक समय जिस पार्टी का कमोबेश पूरे देश पर एकछत्र राज हुआ करता था, वह पार्टी सिकुड़ती एवं सिमटती जा रही है। विभिन्न राज्यों में अपने वजूद को बचाने के लिए राज्यों के छत्रपों के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गयी है।
बिहार में भी वही हुआ। झारखंड में भी उसी तरह की बात हुई। बिहार में राजद के आगे घुटने टेकते हुए उसे महज नौ लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने से समझौता करना पड़ा। हैरत की बात यह है कि जुमा जुमा चार दिन पहले जन्म लेने वाली विकासशील इंसाफ पार्टी एवं हम जैसी पार्टी को तीन तीन सीटें महागठबंधन में दे दी गयी।
इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि कांग्रेस नेताओं की बलि चढ़ रही है। पार्टी के तपे तपाये नेता बगावत पर उतारू हैं। बिहार के मधुबनी में भी वही हुआ और झारखंड के गोड्डा में भी वही संभावना बन रही है। मधुबनी सीट वीआइपी को जाने के बाद बिहार एवं केंद्र की सरकार में अनेक बार मंत्री रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकील अहमद पार्टी से बगावत करते हुए निर्दलीय चुनाव मैदान में कूद पड़े हैं। गोड्डा सीट झाविमो के खाते में जाने से नाराज कांग्रेस के तपे तपाये नेता पूर्व सांसद फुरकान अंसारी भी बगावती तेवर अपनाते हुए नामांकन प्रपत्र खरीद चुके हैं। नामांकन के अंतिम दिन ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि उनका बगावती तेवर बरकरार रहता है या ठंडा पड़ जाता है।



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