-------------------'वत्स '-------------------
नेतृत्वकर्ता लघु परिधि का हो या विस्तृत कार्यक्षेत्र वाला, कुछ खास गुणों का उनमें समाहन होता ही है । जैसे नैसर्गिक तथ्य है कि कोई भी नेता सिर्फ नाम का नहीं हो सकता । काम,अन्य अनेक लोगों का करे या खुदगर्जी में गर्क रहे, अपने हुनर व पात्रता के अनुरूप वह कमोबेश काम करेगा ही । तब, "नेता नाम का या नेता काम का" कहने का सीधा मतलब नेता की दक्षता से है ।
कई चिंतकों का मानना है कि भारत में स्वदेशी सरकारों के इन छ्ह -सात दशकों में राजनीतिक परिवारों नें शक्ल पा ली है ,नेताओं की एक बिरादरी विकसित हो गई है । अमुमन 20-25 वर्षों में परवर्ती पीढी का कोई न कोई नेतृत्व करता दीख जाता है । लेकिन इसके समानांतर सच है कि वगैर किसी राजनीतिक बायग्राउन्ड के ज्यादातर नई पीढियां भी प्रवेश पाती रही हैं ।
झारखंड के प्रमंडल संतालपरगना क्षेत्र के राजनीतिक-क्षितिज पर दो दैदीप्यमान सितारों का जोरदार पदार्पण देखा जा रहा है. । करीब दो दशक पूर्व शिक्षक-पुत्र प्रदीप यादव तथा एक दशक पूर्व निशीकांत दूबे । जन-प्रियता का आलम देखिये ये लोग चुनाव जीतते चले जा रहे हैं ।
सांसद निशिकांत जी ने रेल लाया, सड़कें बनवाई, कई तरह के कॉलेज और स्कूल खुलवाए, डैम -चेकडैम बनवाये, हवाईअड्डा, सार्वजनिक उपयोग के बहुद्देशीय भवनें बनवायी, और अन्य अनेक कार्यों के साथ एम्स जैसी सर्वोपरि स्वास्थ्य संस्थान को लाया. उनकी जन मानस में विकास पुरुष की छवि गहराई, ऊपर से राष्ट्रनायक मोदी के प्रिय पात्रों में जगह बनाना, डॉ दुबे की शौहरत में चार चाँद लगाता है.
प्रदीप यादव जी ने अपने मंत्रित्व काल में क्षेत्र के लोगों को पहली दफा अहसास कराया कि विकास क्या होता है. बड़े- बड़े पुल बनवाये, ग्रामीण सड़कों के जाल बिछाए, प्लस- टू विद्यालय, विवाह भवन, बड़े तालाबों के जीर्णोद्धार, विद्युत् सब स्टेशन, और सबसे अहम कि जबसे प्रतिधित्व संभाले हैं, क्षेत्र व क्षेत्रीय जनों के सुख दुःख से हमेशा जुड़े रहे.
राजनीति के इन नई पौधों नें परस्पर मिलकर लह-लहाने के बजाय, शुरू से आपसी वर्चस्व हेतु टकराने , व घिस-घिस कर ऊर्जा- क्षय करते दीख पड़ते हैं, तो मन में संताप उपजता है.
केंद्रीय मंत्रित्व की भरपूर पात्रता व संभावना संजोये निशिकांत जी एक तरफ हैं तो दूसरी ओर प्रदीप जी झारखंड की राजनीति का दमदार हस्ती. दोनों के भविष्य उज्ज्वल हो सकते, साथ ही यह क्षेत्र उत्तरोत्तर ऊजास पा सकता, किन्तु दोनों के बीच का राजनितिक टकराव थमने का नाम नहीं लेता .
सच है,एक समय भाजपा की राजनीति करने वाले प्रदीप जी गोड्डा क्षेत्र के नियामक थे. इन्होने, झारखंड मुक्ति मोर्चा को यहां परास्त कर छोड़ा था. और जब भाजपा छोडे , तो लगा कि भाजपा को कार्यकर्ता के टोटा पड़ गए. निशिकांत जी नें पार्टी को सह और साथ दिया. अब तो बगिया बिल्कुल लहलहा रही है. ज़ाहिर है गोडडा लोकसभा के छः में से चार विधान सभा क्षेत्र पर भाजपा काबिज है.




Post A Comment:
0 comments so far,add yours