कहलगांव / संवाददाता बालकृष्ण कुमार
कहलगांव- भारतवर्ष में त्योहारों की महान परंपरा रही है।वर्षभर त्योहार मनाएं जाते हैं।उनमें होली भारतीय सनातन संस्कृति का अनुपम,अद्वितीय तथा विश्व में अनुकरणीय पर्व है।यह ऊँच-नीच, गरीब-अमीर, बड़े-छोटे का भेद मिटाता है,कटुता समाप्त कर दूरी मिटाता है तथा सौहाद्रपूर्ण वातावरण का सृजन करता है।होली मनाने के पीछे कई कारण हैं।आमतौर से होलिकादहन और प्रह्लाद पुनर्जीवन को कारण माना जाता है,परंतु इसके अलावे भी कई कथाओं से होली मनाने का कारण प्रदर्शित होता है-आज ही श्रीकृष्ण ने पूतना का वध कर गोपियों के साथ होली का आनंद उठाए थे।एक अन्य कथा में राजा पृथु के राज्य में शिशु भक्षण वाली ढुण्ढा राक्षसी थी।बच्चों द्वारा अग्नि परिक्रमा करने पर उसका अंत हुआ था।यह पर्व फाल्गुन मास के पूर्णिमा को मनाया जाता है।प्रथम दिवस होलिका दहन(धूरखेल) तथा दूसरे दिन होली।होली में होलिका दहन का विशेष महत्त्व है।इसमें अग्नि के दिशा का भी ख्याल रखा जाता है।रविवार को उत्तर, सोम को वायव्य कोण, मंगल को पश्चिम,बुध को नैऋत्य,गुरु को दक्षिण,शुक्र को अग्नि तथा शनि को पूर्व दिशा में ऐसा जलाया जाता है कि राख भी उसी दिशा में गिरे।आज के दिन होलिका के भस्म को मस्तक पर लगाकर भावी संवत्सर की मंगलकामना की जाती है।जलती हुई होलिका पर जौ आदि अन्न फेंकने का विधान है।यह 3 शास्त्रीय नियमों के अनुसार किया जाता है-1.फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा हो।2.प्रदोष रात्रि का समय हो।3.भद्रा बीता हो।-रात्रौ भद्रा$वसाने तु होलिका दीप्यते तदा।।
यह पर्व कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा है।ताड़कासुर का वध चूँकि शिव और पार्वती के पुत्रों से होना था।तब कामदेव ने अपने अस्त्र से शिव की तपस्या भंग की थी,फिर शिव के त्रिनेत्र से स्वयं भस्मीभूत हुआ था।फिर कृष्ण के पुत्र प्रदुम्न के रूप में उत्पन्न होने के कारण रतिमहोत्सव के रूप में भी यह पर्व मनाया जाता है।पहले यह पर्व नारियाँ परिवार के सुख सुविधा हेतू पूर्णचंद्र की पूजा कर करती थी।वैदिक काल में नवात्रैष्टि यज्ञ के रूप में मनाया जाता था।खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान देकर प्रसाद लेने का विधान था।अन्न को होला कहते हैं इसी से इसे होलिकोत्सव भी कहते हैं।आज ही प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था इसलिए इसे मन्वादि तिथि कहते हैं।इसके साथ ही नववर्ष प्रारंभ होता है।फाल्गुन में मनाने के कारण फाल्गुनी भी कहलाता है।यूँ तो यह वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाता है।वैज्ञानिक दृष्टि से इस समय मौसम परिवर्तन हो रहा होता है।इस पर्व को मनाते ही शरीर में नई ऊर्जा आ जाती है।अबीर शरीर के त्वचा को उत्तेजित करता है।होलिका दहन के साथ ही तापमान में वृद्धि होती है।दहन होती हुई होलिका से हमारे शरीर के वैक्टीरिया नष्ट होते हैं।कई रोगों की दवा रंग है।इस पर्व का वर्णन कई ग्रंथों में हुआ है-जैमिनीकृत पूर्वमीमांसा और कथाग्राह्य सूत्र, विष्णु,नारद एवं भविष्य पुराण।संस्कृत साहित्य भी वसंतोत्सव और रति महोत्सव से भरा है-रत्नावली, कुमारसंभवं,दशकुमारचरितं आदि।मुगलकाल में बड़े पैमाने पर होलिकोत्सव मनाया जाता था।यह ईद ए गुलाबी/आब ए पाशी(रंगों की बौछार) के नाम से जाना जाता था।यह पर्व सभी भारतवासियों को एकता के बंधन में बाँधता है।ब्रज की होली,बरसाने की लठमार होली हमेशा से ही आकर्षण का केन्द्र रही है।प्रदेशवासी इस पर्व को अपने2 तरीके से मनाते हैं-बिहार-फगुआ, छत्तीसगढ़-होरी, हरियाणा-धुलंडी,
महाराष्ट्र-रंग पंचमी,पंजाब-होला।आज अपना पराया, दोस्ती दुश्मनी भूलाकर परस्पर गले मिलते है रंग, अबीर लगाकर आत्मीयता प्रदर्शित करते है।शास्त्रों ने आज अभद्र एवं अश्लील वाणी को खुली छूट दी है जिससे सालभर के संचित मानसिक विकार दूर हो।यह सिर्फ भारत की गौरवशाली उदात्त परंपरा में ही सम्भव है।यह पर्व विश्वभर में फैले भारतीयों द्वारा बड़े उत्साह एवं उमंग के साथ मनाते हैं।वस्तूतः होलिका दहन समाज की सभी प्रकार के बुराईयों के अंत का प्रतीक है।यह बुराईयों पर अच्छाईयों की विजय का सूचक है।सर्वे ह्यन्वोन्य मालिङ्ग्य मिलन्ति स्नेहपूर्वकं।प्रतिवर्ष यदायाति सखे$यं होलिकोत्स



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